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जय श्री बालाजी । जय श्री दादोजी । "www.akshaykripa.com" वेबसाईट में दिखाये जाने वाले फोटो तथा विडियो एवं दादोजी श्री अखाराम जी के चमत्कारिक भक्ति, शक्ति और भावनात्मक उल्लेख उनके श्रध्दालुओं की आपबीती घटनाओ से सम्बन्धित है । हम किसी व्यक्ति तथा समुदाय की भावना को ठेस पहुँचाना नही चाहते है । हम सिर्फ दादोजी के भक्तों की आस्था और मान्यताओं को दिखा रहे है । इसमे हम किसी भी तरह का दावा नही करते है एवं किसी भी व्यक्ति तथा समुदाय की भावनाओं को ठेस पहुँचे तो हम क्षमाप्रार्थी है ।

गोठ मांगलोद का दधिमती माता मंदिर शक्तिपीठ

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गोठ और मांगलोद नामक गाँवों के मध्य नागोर जिला मुख्यालय से उत्तर पूर्व में लगभग 44 ंिकमी दूरी पर जायल तहसील में एक प्राचीन शक्तिपीठ स्थित हैं जो दधिमती मंदिर के नाम से विख्यात हैं। दाधिच ब्राहृमण दधिमती माता को अपनी कुल देवी मानते है, तथा इस मंदिर को अपने पूर्वजो द्वारा निर्मित मंदिर मानते हैं। इस मंदिर का निर्माण विक्रम संवंत 665(608र्इ.) के लगभग माना जाता है, जिसके अनुसार इस मंदिर के निर्माण के लिये दाधिच ब्राहृमण द्वारा दान किया गया था, जिसका मुखिया अविघ्न नाग था।

दधिमती माता को महालक्ष्मी का अवतार माना जाता है, दधिमती माता का जन्म माघ शुक्ल सप्तमी (रथ सप्तमी) को आकाश के माध्यम से हुआ माना जाता है , दधिमती माता का मंदिर देवी महामात्य का वर्णन करता उत्तर भारत का सबसे पुराना मंदिर माना जाता है।

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दधिमती माता की कथा

जगत के प्राणियो को अभय प्रदान करने के लिये तथा विकटासुर राक्षस का वध करने के लिये ‘‘ योगमाया महालक्ष्मी’’ महर्षि अथर्वा के घर में भगवती नारायणी दधिमती माता के रुप में प्रकट हुर्इ थी, देवी के भय से विकटासुर दधि सागर में छुप गया था तब भगवती ने दधि सागार का मंथन कर माघ शुक्ला अष्टमी को संध्या काल में विकटासुर का वध किया इसी वजह से वही तिथी जयाष्टमी के नाम से विख्यात है, दधि सागार का मंथन करके विकटासुर को मारने के कारण ब्रहृमाजी ने उनका नाम दधिमथी रखा तथा महर्षि अथरवा को पुत्र प्राप्ती का वरदान दिया। ब्रहृमाजी ने भगवती दधिमती को अपने भार्इ दधिची के वंश की रक्षा करते हुये उनकी कुल देवी होने का आशिर्वाद दिया, अथरवा के पुत्र तथा दधिमती के भार्इ महर्षि दधिची द्वारा विश्व कल्याण एंव धर्म की रक्षा हेतु दैत्यराज वृत्रासुर के वध के लिये अपनी अस्थिया देवताओं को प्रदान कर दी। तब दधिची की गर्भवती पत्नी स्वर्चा सती होने के लिये तत्पर हुर्इ तब देवताओं ने स्मरण कराया की आपके गर्भ मे जो ऋषि का तेज है, वह रुद्र अवतार है पहले आप इसे जन्म दे इस पर ऋषि पत्नि ने अपना गर्भ निकाल कर आश्रम में ऋषि द्वारा स्थापित अश्वत्थ वृक्ष को सोपा और भगवती दधिमती से प्राथना की आप हमारी कुल देवी है, इस बालक की रक्षा करें। कुल देवी दधिमती के सानिध्य में पिपाल वृक्ष के नीचे पलने के कारण ऋषि दधिची के पुत्र का नाम पिप्लाद हुआ,

जय माँ दधिमती

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माँ दधिमती मंदिर पहुचने के प्रमुख मार्ग

१. निकटतम रेलवे स्टेशन

नागौर, डीडवाना, डेगाना, अजमेर, जोधपुर व जयपुर ।

१. निकटतम रेलवे स्टेशन

• जयपुर -> सीकर -> डीडवाना -> जायल -> माँ दधिमती मंदिर
• डीडवाना -> जायल -> माँ दधिमती मंदिर
• जयपुर -> सीकर -> सालासर -> लाडनू -> नीम्बी -> खियाला -> जायल -> माँ दधिमती मंदिर
• अजमेर -> परबतसर -> डीडवाना -> जायल -> माँ दधिमती मंदिर
• अजमेर -> पुष्कर -> मेड़ता -> नागौर -> डेह -> माँ दधिमती मंदिर
• जोधपुर -> नागौर -> डेह -> माँ दधिमती मंदिर
• बीकानेर -> देशनोक -> नागौर -> डेह -> माँ दधिमती मंदिर
• रामदेवरा -> फलोदी -> नागौर -> डेह -> माँ दधिमती मंदिर
• छोटी खाटू माताजी ( जायल ) -> माँ दधिमती मंदिर
• नागौर -> रोल -> माताजी ३२ कि. मी .
• नागौर -> रोल -> जायल -> माताजी ५६ कि. मी

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।। दधिमथी स्तुति ।।

(तर्ज करमा बार्इ को खिचड़लो )

मैया दीज्यो ए परसादी हाथ बढ़ाय बाहर उबा टाबरिया।।टेर।। म्है हां थांरा टाबर मैया तूं है म्हारी माय। क्ुल देवी जगदम्बा अम्बा, लुळ लुळ लागूं पाय।। अम्बा दीज्यो ए चरणामृत अमृत धार...

चरणामृत चरणा को दीज्यो, केशर चन्दन साथ। दूध पतासा मिसरी दीज्यो, मीठा रहसी हाथ। अम्बा दीज्यो ए मेवांरा, भर भर थाल...

अन-धन रा भंडार भरीज्यो, लक्ष्मी दीज्यो अपार। सभी रकम की वस्तु मैया, घर में दीज्यो बसाय। अम्बा दीज्यो ए सोनेरो नौसर हार...

थारं चरणां री भक्ति दीज्यो चोखो दीज्यो ज्ञान। भरी सभा पंचा में मैया, म्हारो राखज्यो मान। मैया दीज्यो ए नैणारी ज्योति अपार...

टाबरियां ने गोद झडूलो, देय बुलाज्यो आप। अत्रि दास शरण मा थांरी, भूल करिज्यो माफ। अम्बा दीज्यो ए, सेवा भक्ति रो सार...

Akharam Ji : One of most legent person of Dadhich Samaj
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भक्त शिरोमणि श्री दादाजी अखारामजी महाराज परसनेऊ गांव के पास ही नाडिया (तालाब) के समीप कैर व कमुठोँ के पास श्री बालाजी महाराज की धुणी रमाते एवं गायेँ चरातेँ थे ।श्रीदादोजी महाराज को गाँव के नागरिक गुंगीया (भोला) कहकर पुकारते थे ।

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सर्प आदि के जहर व भुतप्रेत आदि के प्रभाव से मुक्ति के लिये भभूति व कलवाणी रुपी औषध का वरदान दिया जिससे आज भी वहां भक्तोँ के दुःख क्षणभर मेँ कट जाते हैँ ।

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श्री दादाजी महाराज के श्राद्ध के प्रसाद(लापसी) की ऐसी मान्यता हैँ की अगर जरा भी लापसी का प्रसाद खाने को मिल जाये तो 12 मास व्यक्ति रोगो से दुर रहता हैँ ।

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श्री दादाजी महाराज के जन्म दिवस भादवा बदी पंचमी एवमं आसोज माह मेँ श्राद्ध (आसोज बदी पंचमी) पंचमी पर परसनेऊ धाम मेँ भव्य मेलोँ का आयोजन

  • श्री दादाजी महाराज को वचन सिद्धि प्रदान की
  • भभूति व कलवाणी रुपी औषध का वरदान
  • गरीबो ,निशक्तो एवमं कमजोरो के दास
  • गाँव मेँ 'अक्षय कृष्ण गौशाला '
  • 'दादा अक्षय विकलांग सेवा संस्थान परसनेऊ '
  • ठहरने के लिये धर्मशाला व जल आदि की उत्तम व्यवस्था
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अपनी अस्थियों का दान करने वाले एकमात्र ऋषि महर्षि दधीचि को माना जाता है। प्रतिवर्ष भादव सुदी अष्टमी को पूरे देश में उनके वंशज माने जाने वाले दाधीच उनकी जंयती धूमधाम से मनाते है।

Dec 2011, Jaipur

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श्री दादाजी महाराज गायेँ चराते थे एवमं गरीबो ,निशक्तो एवमं कमजोरो के दास थे ।

Jan 2012, Barmer

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सपरिवार सिद्धपीठ परसनेऊ धाम पधार कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करेँ व श्री दादाजी अखाराम जी महाराज द्वारा चलाई भक्ति की पावन धारा को आगे चलायेँ

March 2012, Chittorgarh

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दधीचि ने कहा कि मै देवलोक की रक्षा के लिए क्या कर सकता हू देवताओ ने उन्हे ब्रहमा विष्णु व महेश की कही बाते बताई तथा उनकी अस्थियो का दान मांगा।

May 2012, Ajmer

Pujari Pariwar
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